इंटरनेट पर बढ़ते एआई कंटेंट और बॉट्स ने डेड इंटरनेट थ्योरी की एक नई बहस छेड़ दी है। आखिर ये थ्योरी है क्या
इंटरनेट आने के बाद पूरी दुनिया में एक क्रांतिकारी बदलाव आया है। आज के समय इंटरनेट पर हर दिन लाखों नई तस्वीरें, वीडियो, पोस्ट और जानकारियां साझा हो रही हैं। हालांकि, इस बीच एक सवाल तेजी से ध्यान खींच रहा है। क्या इंटरनेट पर होने वाली हर गतिविधि के पीछे कोई असली इंसान मौजूद है? इसको लेकर कई तकनीकी विशेषज्ञ एक खास तरह के नए सिद्धांत पर चर्चा कर रहे हैं, जिसे डेड इंटरनेट थ्योरी के नाम से जाना जाता है।
क्या है डेड इंटरनेट थ्योरी?
डेड इंटरनेट थ्योरी के मुताबिक, इंटरनेट पर इंसानों की असली गतिविधियों की जगह धीरे-धीरे एआई से तैयार कंटेंट और बॉट्स लेते जा रहे हैं। इस थ्योरी के अनुसार सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाले कई पोस्ट, कमेट और लाइक्स के पीछे वास्तविक लोग नहीं, बल्कि ऑटोमेटेड अकाउंट्स हो सकते हैं। इसके अलावा इंटरनेट पर एक जैसे कंटेंट की बढ़ती संख्या और एल्गोरिदम के जरिए लोगों की पसंद को प्रभावित करने की कोशिशें भी इस बहस का हिस्सा हैं। इस थ्योरी का दावा है कि इंटरनेट पर मौजूद बड़ी मात्रा में कंटेंट और सोशल मीडिया से जुड़ी गतिविधियां अब इंसानों के बजाय एआई मॉडल्स और बॉट्स के जरिए संचालित हो रही हैं।
इंटरनेट पर बढ़ती बॉट्स की गतिविधियां
इंटरनेट पर इंसानों के मुकाबले बॉट्स की गतिविधियां बढ़ने को लेकर अलग-अलग रिपोर्ट सामने आई हैं। क्लाउडफ्लेयर के मुताबिक जून में बॉट्स ने वेबपेज से जुड़ी कुल रिक्वेस्ट में 57.5 फीसदी हिस्सेदारी दर्ज की। वहीं डाटा सुरक्षा से जुड़ी फ्रांसीसी कंपनी थेल्स की रिपोर्ट के मुताबिक बॉट ट्रैफिक 2023 में लगभग 50 फीसदी था। वहीं उसकी 2026 की रिपोर्ट में यह हिस्सेदारी 53 फीसदी बताई गई है। हालांकि, इन आंकड़ों में अंतर होने की वजह भी है। इंटरनेट पर बॉट्स की गतिवधियों को मापने का कोई एक समान तरीका नहीं है।
कोई भी कंपनी पूरे इंटरनेट के ट्रैफिक पर नजर नहीं रखती। इसलिए अलग-अलग कंपनियों के आकड़े उनके डाटा और मापने के तरीकों के आधार पर बदल सकते हैं। इससे साफ है कि बॉट्स की बढ़ती गतिविधियां चिंता का विषय हैं। हालांकि, इन आंकड़ों को पूरे इंटरनेट की वास्तविक स्थिति का सटीक पैमाना नहीं माना जा सकता। साथ ही बॉट ट्रैफिक का मतलब यह भी नहीं है कि इंटरनेट पर होने वाली आधी से ज्यादा गतिविधियां फर्जी हैं क्योंकि कई बॉट्स वेबसाइटों के लिए जरूरी काम भी करते हैं।
एआई कंटेंट की बाढ़ से क्यों बढ़ रही है चिंता?
आज इंटरनेट एक अलग तरह के संकट से गुजर रहा है, जिसे तकनीकी विशेषज्ञ एआई स्लॉप के रूप में देख रहे हैं। जेनरेटिव एआई के दौर में चैटजीपीटी, मिडजर्नी, जेमिनी, गूगल फ्लो और कई दूसरे एआई वीडियो टूल्स आने के बाद इंटरनेट पर कंटेंट बनाने की लागत और समय काफी कम हो गया है। इसका नतीजा यह है कि हर दिन बड़ी संख्या में एआई से तैयार लेख, तस्वीरें और वीडियो इंटरनेट पर देखने को मिल रहे हैं।
कुछ ही मिनटों में ऐसा कंटेंट तैयार किया जा सकता है, जिसे बनाने में पहले बहुत समय और मेहनत लगती थी। इस बदलाव का असर अब इंटरनेट पर मौजूद ओरिजिनल कंटेंट पर भी दिखाई देने लगा है। पहले इंटरनेट पर लोग अपने अनुभव, विचारों और रचनत्मकता के आधार पर तस्वीरें, वीडियो, ब्लॉग और दूसरी जानकारियां साझा करते थे। वहीं अब एआई टूल्स की मदद से कम समय में बड़ी मात्रा में कंटेंट तैयार किया जा सकता है। इससे इंटरनेट पर एआई से बने कंटेंट की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
सोशल मीडिया पर ऐसे इस्तेमाल हो रहे हैं बॉट्स और एआई
सोशल मीडिया पर बॉट्स और एआई का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ रहा है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर कई बॉट अकाउंट्स ऑटोमेटेड सॉफ्टवेयर की मदद से पोस्ट, कमेंट और लाइक करते हैं। इनकी मदद से नकली रिव्यू, ट्रेंड और कमेंट्स बड़ी संख्या में फैलाए जा सकते हैं। इससे किसी पोस्ट, वीडियो या प्रोडक्ट की लोकप्रियता वास्तविकता से ज्यादा दिखाई दे सकती है। कई बार यूजर्स को यह समझना मुश्किल हो जाता है कि किसी कंटेंट को मिल रहे लाइक्स और कमेंट्स के पीछे असली लोगों की दिलचस्पी है या ऑटोमेटेड गतिविधियां।
इसके अलावा एआई से बनाए गए वर्चुअल इन्फ्लुएंसर्स भी लोगों के बीच अपनी पहचान बना रहे हैं। ये डिजिटल किरदार सोशल मीडिया पर कंटेंट साझा करते हैं और उनके फॉलोअर्स भी होते हैं। हालांकि, ऐसे सभी अकाउंट्स फर्जी नहीं होते, लेकिन इनकी बढ़ती मौजूदगी इंसान और एआई के बीच अंतर को लेकर नए सवाल जरूर खड़े करती है।
यही वे पहलू हैं, जिनकी वजह से डेड इंटरनेट थ्योरी पर चर्चा तेज हुई है। हालांकि, इंटरनेट पर बॉट्स और एआई कंटेंट की बढ़ती मौजूदगी अपने आप में इस बात का सबूत नहीं है कि पूरा इंटरनेट इंसानों से खाली हो चुका है। असली सवाल यह है कि इंटरनेट पर दिखाई देने वाली गतिविधियों में इंसानों, बॉट्स और एआई की हिस्सेदारी कितनी है और ऑनलाइन दुनिया पर भरोसा बनाए रखने के लिए इन्हें पहचानना कितना जरूरी है।
