देश के अधिकांश हिस्सों में मानसून सक्रिय होने के बावजूद अल-नीनो का खतरा बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बारिश कमजोर रही तो खरीफ फसलों, ग्रामीण मांग और एफएमसीजी सेक्टर पर दबाव बढ़ेगा। एडीबी ने महंगाई का अनुमान बढ़ाया है और आर्थिक वृद्धि के अनुमान में भी कटौती की है।
देश के अधिकांश इलाकों में भले ही मानसून की गतिविधियां मजबूत हुई है, लेकिन अल-नीनो का जोखिम अभी टला नहीं है। अगले कुछ हफ्तों में मानसून अपनी राह से भटक गया तो इसकी सीधी चोट ग्रामीण मांग पर पड़ेगी। इसकी वजह से भारत के एफएमसीजी क्षेत्र को आने वाली तिमाहियों में नई बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।
एडीबी ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की आर्थिक विकास दर का अनुमान घटाकर 6.6 फीसदी कर दिया है, जबकि अप्रैल में इसके 6.9 फीसदी रहने का अनुमान लगाया गया था। एशियाई विकास बैंक ने अपने एशियन डेवलपमेंट आउटलुक के जुलाई अंक में कहा, साल 2026 की शुरुआत में उपभोग और निवेश के दम पर आर्थिक गतिविधियां मजबूत रहीं, लेकिन ऊर्जा की ऊंची लागत, आपूर्ति में रुकावटें और कड़े वित्तीय हालात के कारण आने वाले महीनों में विकास की रफ्तार धीमी होने की आशंका है। इसका असर धीरे-धीरे ही खत्म होगा। एडीबी के मुताबिक, वित्त वर्ष 2027-28 के लिए भारत की वृद्धि और महंगाई दोनों के आउटलुक को क्रमशः 7.3 फीसदी और 4 फीसदी पर बरकरार रखा गया है। उम्मीद है, कीमतों का दबाव कम होने के बाद आर्थिक गतिविधियों में दोबारा सुधार आएगा।
मानसून की कमी कई माध्यमों से एफएमसीजी क्षेत्र को प्रभावित कर सकती है। शुरुआत में, कमजोर मानसून की आशंका से स्टॉक घटेगा और मांग में सुस्ती आ सकती है। अगले एक से दो महीनों के भीतर कम फसल उत्पादन खाद्य महंगाई को बढ़ा सकता है। इससे परिवारों का विवेकाधीन खर्च कम हो जाएगा क्योंकि वे आवश्यक खरीदारी को प्राथमिकता देंगे।
बाद के चरण में खरीफ उत्पादन में कमी से कृषि आय घट सकती है, विशेष रूप से बारिश पर निर्भर क्षेत्रों में। इसका प्रभाव दो से तीन महीनों के बाद अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देगा, जो ग्रामीण खपत को और भी कम करेगा। अल-नीनो के चलते अगर वर्षा वास्तव में कम होती है तो इसका प्रभाव पूरे कैलेंडर वर्ष या उसके आगे भी जारी रहेगा।
