विश्वसनीय भी, सराहनीय भी: केंद्रीय बजट 2026-27

केंद्रीय बजट 2026-27 ने जोखिम के बदले समझदारी और बड़े सुधारों के बदले विविध उपायों को तरजीह दी है

जहां बजट 2025 में ज्यादातर आयकर के दरों और स्लैब में छूट पर जोर दिया गया था, वहीं बजट 2026 में बड़े बदलाव वाले कदम नहीं उठाए गए हैं। इसके बजाय अलग-अलग क्षेत्रों और मुद्दों पर आधारित उपायों के जरिए अपनाए गए इसके बिखरे हुए तरीकों को जब मिलाकर एक साथ देखा जाता है, तो इसका मकसद मध्यम अवधि में देश के विकास को आगे बढ़ाना नजर आता है।

जिस किस्म की भू-आर्थिक और भू-राजनैतिक अनिश्चितताओं का सामना भारतीय अर्थव्यवस्था कर रही है, उसके मद्देनजर यह फैला हुआ तरीका लक्षित बड़े एलानों के मुकाबले कहीं ज्यादा कारगर नीति साबित हो सकती है। यह और ज्यादा गड़बड़ी का वक्त नहीं है। बजट 2026 में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र और अलग-अलग सेवा क्षेत्रों के लिए घोषणाओं के साथ-साथ वस्त्र और चमड़ा जैसे श्रम आधारित क्षेत्रों की मदद के लिए भी खास प्रावधान हैं। मैन्यूफैक्चरिंग के मामले में, इस बजट में सोच-समझकर चुने गए सात क्षेत्रों – बायोफार्मा, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, दुर्लभ खनिज (रेयर अर्थ), रसायन (केमिकल्स), पूंजीगत सामान और वस्त्र – को शामिल किया गया है। सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्यूफैक्चरिंग कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें सरकार की मौजूदा उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं से फायदा हुआ है। इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्यूफैक्चरिंग स्कीम के तहत बढ़ाया गया आवंटन इसी दिशा में सही कदम हैं। ये दोनों ऐसे क्षेत्र हैं जहां भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने की जरूरत है।

बायोफार्मा शक्ति योजना का मकसद अगले पांच सालों में 10,000 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ भारत को वैश्विक स्तर का एक बायोफार्मा मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाना है। फार्मास्यूटिकल्स, जो पहले से ही एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें भारत अच्छा प्रदर्शन करता है, को अमेरिका के 50 फीसदी टैरिफ से छूट मिली हुई है। लेकिन उन क्षेत्रों की मदद करना भी जरूरी है जो फिलहाल इन टैरिफों से प्रभावित हैं। पिछले बजट में घोषित राष्ट्रीय निर्यात संवर्धन मिशन को वित्तीय वर्ष के नौ महीने बीत जाने के बाद, दिसंबर 2025 में ही लागू किया जा सका था।

केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस बजट में वस्त्र क्षेत्र के लिए घोषित समेकित कार्यक्रम (इंटीग्रेटेड प्रोग्राम) के साथ इसी किस्म की देरी न हो। इसी तरह, ‘चैंपियन एमएसएमई’ बनाने और उन्हें हिस्सेदारी (इक्विटी), तरलता (लिक्विडिटी) एवं पेशेवर मदद देने के मकसद से उठाए गए विभिन्न कदमों को भी जल्दी लागू किया जाना चाहिए। भारत के निर्यात में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की भागीदारी 48.6 फीसदी की है और यूरोपीय संघ के साथ किया गया मुक्त व्यापार समझौता (ईयू एफटीए), भले ही इसे जल्द ही लागू कर दिया जाए, इतनी जल्दी वह असर नहीं दिखा पाएगा कि अमेरिकी टैरिफ से हो रहे नुकसान की भरपाई हो सके। सेवा क्षेत्र को भी बजट 2026 से फायदा होगा। वित्त मंत्री द्वारा घोषित उच्चाधिकार-प्राप्त ‘शिक्षा से रोजगार और उद्यम’ स्थायी समिति को जल्दी से काम शुरू कर देना चाहिए।

स्वास्थ्य सेवा और स्वास्थ्य पर्यटन, जहां भारत पहले से ही अपनी ताकत बढ़ा रहा है, पर जोर एक अच्छी शुरुआत है। बजट के बहुआयामी नजरिए के अनुरूप, केंद्र सरकार ने पहले की तरह बड़े पैकेज देने के बजाय इस साल चुनाव वाले राज्यों को कई छोटे-छोटे एलान करके फायदा पहुंचाने की कोशिश की है – मसलन ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के फायदे के लिए समर्पित दुर्लभ खनिज गलियारा (डेडिकेटेड रेयर अर्थ कॉरिडोर), केरल के लिए नारियल प्रोत्साहन योजना, पश्चिम बंगाल के लिए एकीकृत पूर्वी तटीय औद्योगिक गलियारा (इंटीग्रेटेड ईस्ट कोस्ट इंडस्ट्रियल कॉरिडोर) और नए राष्ट्रीय जलमार्गों में से पहला ओडिशा में शुरू होगा।

जहां तक केंद्र के वित्तीय प्रबंधन की बात है, बजट 2026 में खर्च के मामले में उत्साह और राजस्व के मोर्चे पर समझदारी का मिश्रण देखने को मिलता है। पूंजीगत खर्च, खासकर बुनियादी ढांचे के निर्माण के मामले में, को बढ़ावा देना शायद इस बात का एहसास होने पर जारी रखा गया है कि मौजूदा हालात निजी निवेश को बढ़ावा नहीं देते। कुल मिलाकर, पूंजीगत खर्च 2026-27 में बढ़कर 12.2 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है, जोकि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 4.4 फीसदी होगा। यह पिछले कम से कम 10 सालों में सबसे ज्यादा है। इसमें समर्पित माल ढुलाई गलियारा (डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर) और जरूरी श्रमशक्ति (मैनपावर) के लिए प्रशिक्षण संस्थान (ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट) का एलान शामिल है। इन रेल गलियारों को अंतर्देशीय जलमार्गों (इनलैंड वॉटरवे) और तटीय नौ-परिवहन (कोस्टल शिपिंग) का हिस्सा बढ़ाने को प्रोत्साहन देने वाली तटीय कार्गो संवर्धन योजना (कोस्टल कार्गो प्रमोशन स्कीम) के जरिए भी समर्थन दिया जाएगा। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने 2025-26 के लिए अपने पूंजीगत खर्च को बजट के शुरू में रखे गए 11.2 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 10.9 लाख करोड़ रुपये कर दिया है। यह देखना बाकी है कि इस साल का लक्ष्य पूरा होगा या नहीं, लेकिन इसके करीब पहुंचने से भी अर्थव्यवस्था को काफी बढ़ावा मिलेगा। राजस्व के मोर्चे पर, केंद्र सरकार ने व्यक्तियों या कंपनियों के लिए करों में कोई बड़ी कटौती का एलान नहीं किया। साल 2019 और 2025 में, कंपनियों और व्यक्तियों को करों में काफी राहत मिली थी। और ज्यादा घोषणाएं करने से वैसे वक्त में केंद्र के वित्त पर बेवजह दबाव पड़ता, जब उसकी खर्च संबंधी प्रतिबद्धताएं – ज्ञात और अनुमानित – काफी ज्यादा हैं। यूं तो प्रत्यक्ष कर में जहां ज्यादातर प्रक्रियात्मक सुधार किए गए हैं, वहीं बजट में समुद्री, चमड़े एवं वस्त्र उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने और देश के ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव को तेज करने के वास्ते अप्रत्यक्ष करों में कई छूटें शामिल की गई हैं। कर राजस्व का अनुमान काफी हद तक सामान्य ही है। कॉरपोरेट कर राजस्व में 2025-26 के बजट अनुमानों (बीई) के मुकाबले लगभग 14 फीसदी की बढ़ोतरी का अनुमान है। यह मोटे तौर पर 2025-26 के संशोधित अनुमानों के अनुरूप ही है, जो पिछले साल के असल आंकड़ों से 12.4 फीसदी ज्यादा हैं। आयकर राजस्व में 2025-26 के बीई के मुकाबले 1.9 फीसदी की बढ़ोतरी का बजट रखा गया है – पिछले बजट में दी गई करों में बड़ी छूटों के बाद यह एक अपेक्षित नतीजा है। साल 2026-27 में सकल जीएसटी राजस्व में 13.5 फीसदी की गिरावट का अनुमान है, जो सितंबर 2025 में दरों के युक्तिकरण और मुआवजा उपकर (कंपनसेशन सेस) खत्म होने का नतीजा है। कुल मिलाकर, केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा 2026-27 में जीडीपी का 4.3 फीसदी रहने का अनुमान है, जोकि 2025-26 के लिए अनुमानित 4.4 फीसदी से कम है। कोविड-19 महामारी के बाद से केंद्र सरकार का राजकोषीय समेकन (फिस्कल कंसोलिडेशन) का रास्ता काबिलेतारीफ रहा है, लेकिन घाटे को कम करने में लगातार तेजी पर कुछ सवाल उठाए जा सकते हैं। भू-आर्थिक और भू-राजनैतिक स्थितियों के मद्देनजर आर्थिक समीक्षा ने भी केंद्र सरकार के लिए कुछ राजकोषीय लचीलेपन (फिस्कल फ्लेक्सिबिलिटी) की तजवीज की थी। कुल मिलाकर बजट 2026 उन लोगों को निराश कर सकता है जो करों में बड़ी छूट या सब्सिडी की आस लगाए बैठे थे, लेकिन फिर भी यह एक विश्वसनीय और सराहनीय कोशिश है।

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