ब्रिक्स का आकार बढ़ा, पर घटी एकता: साझा सुर की राह कठिन; क्या भारत सभी सदस्यों के बीच सहमति बना पाएगा?

ब्रिक्स का कुनबा बढ़ा है, लेकिन इसके साथ देशों के बीच मतभेद भी गहरे हुए हैं। मई की बैठक में संयुक्त बयान तक नहीं बन पाया था। अब सवाल है कि शिखर सम्मेलन में भारत इन मतभेदों के बीच सभी देशों को साथ ला पाएगा?

आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से ठीक पहले कूटनीतिक हलकों में यह सवाल सबसे अहम है कि क्या ब्रिक्स देश अपने आपसी मतभेद भुलाकर एक मजबूत साझा सुर तलाश पाएंगे। इस चिंता की मुख्य वजह यह है कि भारत की अध्यक्षता में मई में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में तमाम कोशिशों के बावजूद किसी संयुक्त घोषणापत्र पर आम सहमति नहीं बन पाई थी। ब्रिक्स पारंपरिक रूप से सर्वसम्मति से काम करता है, लेकिन असहमति इस बात का संकेत है कि जैसे-जैसे इसका कुनबा बढ़ा है, वैसे-वैसे इसके भीतर अंतर्विरोध भी गहरे हुए हैं।

क्यों फंसा था पेंच? : विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान मुख्य रूप से पश्चिम एशिया की स्थिति, फलस्तीन मुद्दे और लाल सागर में नौवहन सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर सदस्य देशों के बीच तीखा मतभेद देखने को मिला था। इस गतिरोध के केंद्र में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात थे। ईरान ने पश्चिम एशिया संघर्ष पर कड़ी भाषा की मांग की, जबकि यूएई समेत कुछ सदस्यों ने आपत्ति जताई। ईरान ने फिलिस्तीन और लाल सागर से जुड़े कुछ प्रावधानों पर कड़ी आपत्ति जताई थी। नतीजतन संयुक्त बयान के स्थान पर भारत को अध्यक्षीय बयान से ही संतोष करना पड़ा।
विस्तारित कुनबे की जटिलताएं
ब्रिक्स में अब केवल पांच पारंपरिक देश- ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका- के साथ-साथ मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और इंडोनेशिया भी जुड़ चुके हैं। दुनिया की बहुत बड़ी आबादी और अर्थव्यवस्था की नुमाइंदगी करने वाले इस विस्तारित मंच का आकार जितना बढ़ा है, कूटनीति के पेचीदा मामलों पर आमराय कायम करना उतना ही कठिन होता गया है। संगठन के भीतर अलग-अलग सामरिक गठबंधनों से जुड़े देशों के हित टकराते हैं, तो सहमति तलाशना कठिन साबित होता है।
संतुलन साधने की परीक्षा
ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाल रहे भारत के सामने कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की दोहरी चुनौती है। भारत की अध्यक्षता का मुख्य फोकस लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के एजेंडे के तहत वैश्विक दक्षिण की आवाज मजबूत करना है। साथ ही आर्थिक-तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देना रहा है। हालांकि पश्चिम एशिया संघर्ष और बढ़ते ध्रुवीकरण के बीच भारत को यह सुनिश्चित करना पड़ रहा है कि ब्रिक्स किसी एकपक्षीय गुट के रूप में उभर कर न आए। इसकी बजाय विकासशील देशों के आर्थिक हितों का मंच बना रहे।

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