हिंदूकुश हिमालयी क्षेत्र में तेजी से पिघलते ग्लेशियर और पर्माफ्रॉस्ट आठ देशों की करीब 200 करोड़ आबादी के लिए खतरा बढ़ा रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, क्षेत्र में करीब 40 हजार ग्लेशियर हैं, लेकिन निगरानी सिर्फ 21 की हो रही है। भारत में 56 ग्लेशियर झीलें अत्यंत उच्च खतरे की श्रेणी में बताई गई हैं। ग्लेशियर पिघलने से बाढ़, भूस्खलन और झील फटने जैसी घटनाओं का जोखिम बढ़ रहा है।नेपाल में ग्लेशियर पिघलकर झील में समाने से आई भीषण त्रासदी सिर्फ एक शुरुआती संकेत है। सच्चाई यह है कि पूरे हिमालय में ग्लेशियर पिघल रहे हैं और सदियों से जमी जमीन (पर्माफ्रॉस्ट) पिघल रही है। इसकी जद में भारत, नेपाल, चीन, पाकिस्तान समेत 8 देशों की 2 अरब की आबादी है। भारत पर इसका सबसे ज्यादा खतरा है, क्योंकि अकेले इस भूभाग में ग्लेशियर से बनीं करीब 200 झीलें अपने किनारे तोड़कर बाढ़ में भीषण तबाही ला सकती हैं।
सिस्टेमिक की रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमालयी ग्लेशियर पिघलने से भूस्खलन, झीलें फटना व उफनती नदियों का खतरा दुनिया के इस सबसे ऊंचे क्षेत्र के अरबों लोगों पर मंडरा रहा है। इसमें भारत भी पूरी तरह शामिल है। अकेले हिंदूकुश क्षेत्र के आठों देश ग्लेशियरों की सही निगरानी नहीं कर रहे हैं। रिपोर्ट की सह-लेखिका आरुषि चोपड़ा ने कहा, ऐसी घटनाएं आगे भी जारी रहना सुनिश्चित है। सवाल यह नहीं कि होंगी या नहीं, सवाल सिर्फ यह है कि कब होंगी।
अब और अधिक होंगी ऐसी घटनाएं
नॉर्वे सरकार के लिए पृथ्वी के जमे हुए हिस्सों (क्रायोस्फीयर) पर शोध करने वाली वैज्ञानिक मिरियम जैक्सन ने कहा, इन राष्ट्रीय सीमाओं के पार कहीं ज्यादा डाटा-साझेदारी और संवाद जरूरी है। ऐसी घटनाएं अब और अधिक होंगी, क्योंकि क्रायोस्फीयर बहुत तेजी से बदल रहा है, और ज्यादा से ज्यादा लोग इन खतरों के करीब बसते जा रहे हैं। इसीलिए इन क्षेत्रों के लोग लगातार जलवायु परिवर्तन की सीधी मार झेल रहे हैं।
तापमान कम रहे तो भी खत्म होंगी एक-तिहाई झीलें
डॉ. जैक्सन के अनुसार, 2010-2019 के बीच ग्लेशियर पिछले दशक के मुकाबले 65% तेज रफ्तार से पिघले। उनके ही संस्थान की एक पुरानी रिपोर्ट के मुताबिक, यदि वैश्विक तापमान वृद्धि 2015 पेरिस समझौते की 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा तक भी सीमित रहे, तो भी इस सदी के अंत तक हिंदूकुश हिमालय के एक-तिहाई ग्लेशियर खत्म हो चुके होंगे दुनिया 1.5 डिग्री की सीमा पार कर चुकी है।
भू-राजनीतिक तनाव भी बड़ी बाधा
काठमांडो स्थित रेड क्रॉस रेड क्रिसेंट क्लाइमेट सेंटर के तकनीकी सलाहकार माधब उप्रेती कहते हैं, यह त्रासदी सीमा-पार निगरानी के लिए नए मौके खोलेगी। चूंकि कई बाढ़, भूस्खलन झेल चुके नेपाल जैसे देश में 26 अगस्त अभूतपूर्व घटना थी, जबकि इतने बड़े पैमाने पर इसका पता लगाने के लिए कोई मौजूदा निगरानी या चेतावनी व्यवस्था तक नहीं थी।
हर ग्लेशियर पर कैमरा नामुमकिन, हॉटस्पॉट्स की पहचान जरूरी
यूट्रेक्ट यूनिवर्सिटी नीदरलैंड्स के माउंटेन हाइड्रोलॉजिस्ट वाल्टर इमरजील बताते हैं कि 44,000 ग्लेशियरों में से हर एक पर वैज्ञानिक तैनात करना अव्यावहारिक है। ऐसे में सबसे पहले उन संवेदनशील ग्लेशियरों की मैपिंग हो जो सीधे किसी बड़े शहर, गांव या जलविद्युत बांध के ठीक ऊपर स्थित हैं।
सैटेलाइट और रडार तकनीक : रडार इंटरफेरोमेट्री और सैटेलाइट इमेजरी के जरिए पहाड़ों के खिसकने, चट्टानों में दरार पड़ने और झीलों के जलस्तर में अचानक उछाल की पूर्व चेतावनी को तुरंत निचले इलाकों तक पहुंचाई जाए।
