21 राज्यों में UCC लागू करने का भाजपा ने बनाया प्लान, 2029 तक इसे जमीन पर उतारने की क्या है योजना?

यूसीसी को लेकर भाजपा ने 2029 से पहले बड़ा लक्ष्य तय किया है। लेकिन इसे जमीन पर उतारने की राह इतनी आसान नहीं है। जहां कई राज्यों में इसकी प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है, वहीं एनडीए के भीतर ही कुछ सहयोगी दलों के अलग रुख ने नई चुनौती खड़ी कर दी है। 

देश में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लेकर एक बार फिर सियासी हलचल तेज है। गृह मंत्री अमित शाह ने एनडीए शासित सभी राज्यों में इसे लागू करने के लक्ष्य की घोषणा की है। हालांकि, एनडीए के सहयोगी दलों की राय अलग-अलग नजर आ रही है। वहीं, विपक्षी दल भाजपा पर आरोप लगा रहे हैं।

ऐसे में आइए जानते हैं कि यूसीसी क्या है? संविधान इस पर क्या कहता है? इसका इतिहास क्या है? गृह मंत्री ने क्या घोषणा की है? एनडीए के दलों का क्या कहना है? विपक्ष क्या आरोप लगा रहा है?

समान नागरिक संहिता क्या है?

समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी का अर्थ है हर नागरिक के लिए एक समान कानून, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। इसके लागू होने के बाद संबंधित राज्य में शादी, तलाक, गोद लेने और जमीन-जायदाद के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होते हैं।

यह मुद्दा कई दशकों से राजनीतिक बहस के केंद्र में रहा है। यूसीसी केंद्र की मौजूदा सत्ताधारी भाजपा के लिए जनसंघ के जमाने से प्राथमिकता वाला एजेंडा रहा है। भाजपा सत्ता में आने पर यूसीसी को लागू करने का वादा करने वाली पहली पार्टी थी और यह मुद्दा उसके 2019 के लोकसभा चुनाव के घोषणापत्र का भी हिस्सा था। इसके साथ ही उसके शासन वाले राज्यों में इसे जोर-शोर से लागू भी कराया जा रहा है।

संविधान इस पर क्या कहता है?

देश में संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता को लेकर प्रावधान है। इसमें कहा गया है कि राज्य इसे लागू कर सकता है। इसका उद्देश्य धर्म के आधार पर किसी भी वर्ग विशेष के साथ होने वाले भेदभाव या पक्षपात को खत्म करना और विविध सांस्कृतिक समूहों के बीच सामंजस्य स्थापित करना था। संविधान निर्माता डॉ. बीआर आम्बेडकर ने कहा था कि यूसीसी जरूरी है, लेकिन फिलहाल यह स्वैच्छिक रहना चाहिए।

संविधान के मसौदे के अनुच्छेद 35 को भारत के संविधान के भाग चार में अनुच्छेद 44 के रूप में राज्य नीति के निदेशक सिद्धांतों के हिस्से के रूप में जोड़ा गया था। इसे संविधान में इस नजरिए के रूप में शामिल किया गया था जो तब पूरा होगा जब राष्ट्र इसे स्वीकार करने के लिए तैयार होगा और यूसीसी को सामाजिक स्वीकृति दी जा सकती है।

इसका इतिहास क्या है?

यूसीसी की उत्पत्ति औपनिवेशिक भारत में हुई जब ब्रिटिश सरकार ने 1835 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में अपराधों, सबूतों और अनुबंधों से संबंधित भारतीय कानूनों की एकरूपता की आवश्यकता पर जोर दिया गया था। विशेष रूप से इसमें यह सिफारिश की गई थी कि हिंदुओं और मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों (पर्सनल लॉ) को  इस तरह के संहिताकरण के बाहर रखा जाए।

ब्रिटिश सरकार को 1941 में हिंदू कानून को संहिताबद्ध करने के लिए बी एन राव समिति बनाई। समिति ने शास्त्रों के अनुसार, एक संहिताबद्ध हिंदू कानून की सिफारिश की, जो महिलाओं को समान अधिकार देगा। इसके साथ ही समिति ने हिंदुओं के लिए विवाह और उत्तराधिकार के मुद्दों में भी नागरिक संहिता की सिफारिश की।

अमित शाह ने क्या कहा?

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सिंतबर को मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि कई राज्यों में यूसीसी लागू किया जा चुका है और उन्हें भरोसा है कि 2029 से पहले बीजेपी-एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में इसे लागू कर दिया जाएगा।

भाजपा राज्यवार यूसीसी क्यों ला रही है?

इसके पीछे संवैधानिक और राजनीतिक, दोनों वजहें हैं। संविधान की समवर्ती सूची की एंट्री पांच में शादी, तलाक, गोद लेना, वसीयत, उत्तराधिकार और संयुक्त परिवार से जुड़े मामले आते हैं। इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र और राज्य, दोनों के पास है। इसलिए राज्य अपने स्तर पर यूसीसी से जुड़े कानून बना सकते हैं।

राजनीतिक तौर पर मामला ज्यादा जटिल है। भारत में अलग-अलग धर्मों, समुदायों और क्षेत्रों की व्यक्तिगत कानून व्यवस्था और परंपराएं अलग हैं। खासकर आदिवासी समुदायों और पूर्वोत्तर राज्यों में पारंपरिक नियमों की अहम भूमिका है।

ऐसे में पूरे देश के लिए एक कानून बनाते समय इन अलग-अलग परंपराओं और संवैधानिक सुरक्षा को ध्यान में रखना होगा। राज्यवार यूसीसी लागू करने से स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से कानून बनाने की गुंजाइश रहती है।

किन राज्यों में यूसीसी की दिशा में कदम बढ़े?

अब तक चार भाजपा शासित राज्यों ने यूसीसी से जुड़े कानून पारित किए हैं, उत्तराखंड, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश। उत्तराखंड में यूसीसी लागू हो चुका है, जबकि बाकी राज्यों में कानून लागू होने की प्रक्रिया चल रही है। वहीं गोवा- राज्य में 1867 से समान सिविल कोड लागू है।

उत्तराखंड
उत्तराखंड में 27 जनवरी 2025 से यूसीसी लागू है। इसमें शादी, तलाक, विरासत और उत्तराधिकार के लिए समान नियम हैं। बहुविवाह पर रोक और शादी का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर भी इसमें खास प्रावधान हैं। जोड़ों को लिव-इन रिलेशनशिप और उसके खत्म होने का पंजीकरण कराना होता है। ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों को वैध माना गया है।

गुजरात
गुजरात विधानसभा ने 24 मार्च 2026 को यूसीसी बिल पारित किया। इसका मॉडल काफी हद तक उत्तराखंड जैसा है। इसमें शादी, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े प्रावधान हैं और बहुविवाह पर रोक का प्रावधान है।

असम
असम ने मई 2026 में यूसीसी बिल पारित किया। इसमें शादी, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप को शामिल किया गया है। बहुविवाह पर रोक और लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण का प्रावधान भी है।

मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश विधानसभा ने जुलाई 2026 में यूसीसी बिल पारित किया। इसमें शादी, तलाक और उत्तराधिकार के साथ गोद लेने से जुड़े प्रावधान भी हैं। इसमें ट्रिपल तलाक और निकाह हलाला से जुड़े प्रावधानों का भी उल्लेख है। बहुविवाह पर रोक और लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण का प्रावधान भी है।

पश्चिम बंगाल
राज्य सरकार ने यूसीसी लागू करने की घोषणा की है। सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में समिति बनाई गई है, जो ड्राफ्ट विधेयक की समीक्षा कर रही है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि समिति की रिपोर्ट के आधार पर विधेयक आगे बढ़ाया जाएगा।

महाराष्ट्र में भी यूसीसी की तैयारी शुरू

शाह के बयान के अगले दिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि राज्य सरकार यूसीसी तैयार करने के लिए समिति बना चुकी है। उन्होंने बताया कि सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय समिति अपनी सिफारिशों पर काम कर रही है।

फडणवीस ने कहा कि समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद सरकार यूसीसी लागू करने की दिशा में आगे बढ़ेगी। राज्य सरकार की योजना इसे विधानसभा के शीतकालीन सत्र में पेश करने की भी है।

भाजपा के सहयोगी दल की प्रतिक्रिया क्या रही?

नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जनता दल (यूनाइटेड) यानी जदयू मुख्य रूप से बिहार राज्य में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का सहयोगी दल है। अमित शाह के बयान के बाद एनडीए के भीतर सबसे ज्यादा चर्चा जदयू के रुख को लेकर हुई।

जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा कि वह अमित शाह से मुलाकात कर इस मुद्दे पर चर्चा करेंगे। पार्टी का कहना है कि यूसीसी पर आगे बढ़ने से पहले धार्मिक समुदायों, राज्य सरकारों और दूसरे हितधारकों से व्यापक बातचीत होनी चाहिए।

वहीं, जदयू नेता श्याम रजक ने इससे भी स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि बिहार में यूसीसी लागू नहीं होने दिया जाएगा। पार्टी का कहना है कि नीतीश कुमार का पहले से यही रुख रहा है कि यूसीसी पर व्यापक सहमति के बाद ही आगे बढ़ना चाहिए।

लोजपा का क्या कहना है?

चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) मुख्य रूप से बिहार राज्य में एनडीए की एक महत्वपूर्ण सहयोगी दल है। पासवान ने भी जल्दबाजी के बजाय व्यापक चर्चा की बात कही।

उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी समानता के साथ विविधता के लिए भी प्रतिबद्ध है। संविधान में अलग-अलग समुदायों की परंपराओं और प्रथाओं को मान्यता मिली हुई है। उन्होंने अनुसूचित जनजातियों को अलग-अलग संवैधानिक प्रावधानों के तहत मिली छूट का उदाहरण दिया।

चिराग पासवान ने कहा कि यूसीसी का प्रस्ताव सार्वजनिक होना चाहिए, सभी हितधारकों के हितों पर विचार होना चाहिए और व्यापक चर्चा के बाद ही पार्टी अपना रुख स्पष्ट करेगी।

टीडीपी का क्या रुख है?

आंध्र प्रदेश में एनडीए की सहयोगी टीडीपी के संसदीय दल के नेता लावु श्रीकृष्ण देवरायालु ने कहा कि फिलहाल यूसीसी को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई है। जरूरत पड़ने पर पार्टी इस पर विचार करेगी और इसे लागू करने से पहले अलग-अलग हितधारकों से बातचीत की जाएगी।

विपक्ष का क्या कहना है?

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का आरोप है कि भाजपा यूसीसी को समानता लाने के लिए नहीं, बल्कि देश के करीब 18 करोड़ मुस्लिमों को निशाना बनाने के लिए आगे बढ़ा रही है। उन्होंने भाजपा और आरएसएस पर गैर-हिंदू समुदायों पर बहुसंख्यक कानून थोपने की कोशिश का आरोप लगाया।

उन्होंने यूसीसी को संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 29 से जोड़ते हुए सवाल उठाए और कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

उमर अब्दुल्ला ने क्या सवाल उठाया?
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्यवार यूसीसी लागू करने की रणनीति पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अगर यूसीसी पूरे देश के लिए है तो इसे अलग-अलग राज्यों के जरिए क्यों लागू किया जा रहा है। उनका तर्क है कि नागरिक कानून बनाने का काम संसद के जरिए होना चाहिए।

उमर अब्दुल्ला ने एनडीए के भीतर जदयू के रुख का हवाला देते हुए कहा कि जब गठबंधन के सभी दल यूसीसी पर सहमत नहीं हैं, तो पूरे देश में इसे लागू करने के लिए संसद में कानून पारित कराना भी चुनौतीपूर्ण होगा।

 

 

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