जलवायु परिवर्तन से मध्य हिमालय की जैव विविधता पर खतरा मंडरा रहा है। हिमपात में कमी, असंतुलित वर्षा और बढ़ते मानव हस्तक्षेप से औषधीय पौधे व वन्यजीव प्रभावित हो रहे हैं।
मध्य हिमालय में जलवायु परिवर्तन का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। हिमपात में कमी, बारिश के पैटर्न बदलाव और बढ़ते मानव हस्तक्षेप ने क्षेत्र की जैव-विविधता पर गंभीर खतरा पैदा कर दिया है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, इससे वनस्पतियों की संरचना, जल स्रोतों की स्थिति और वन्यजीवों के व्यवहार में तेजी से बदलाव हो रहा है।
गढ़वाल केंद्रीय विवि श्रीनगर के पर्यावरण विशेषज्ञों का यह शोध इंटरनेशनल जर्नल ऑफ बायोडायवर्सिटी साइंस, ईकोसिस्टम सर्विसेस एंड मैनेजमेंट में प्रकाशित हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए सामुदायिक भागीदारी, जल स्रोत संरक्षण, औषधीय पौधों का वैज्ञानिक प्रबंधन और विकास नीतियों को नए सिरे से प्राथमिकता देनी होगी। उनका कहना है कि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो मध्य हिमालय की पारिस्थितिक स्थिरता और उससे जुड़ी करोड़ों लोगों की आजीविका गंभीर संकट में पड़ सकती है।
वन क्षेत्रों के लगातार विदोहन और प्राकृतिक भोजन की कमी के कारण वन्यजीव अब आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे फसलों और पशुधन को नुकसान पहुंचने की घटनाएं बढ़ी हैं। विशेषज्ञों के अनुसार सड़क निर्माण, जलविद्युत परियोजनाओं और पर्यटन विस्तार से वन्यजीवों के आवास को नुकसान पहुंचा है। जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं भी बढ़ी हैं।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
टीम के साथ मध्य हिमालयी क्षेत्र में वर्ष 1988-89 से शोध कर रहे हैं। समस्या को केवल जलवायु परिवर्तन या केवल विकास परियोजनाओं के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। वैज्ञानिक रणनीति ही दीर्घकालिक समाधान दे सकती है।- वैज्ञानिक प्रो. आरके मैखुरी, एचओडी पर्यावरण विभाग, एचएनबी श्रीनगर।
Post Views: 8